आखिर क्यों बॉलीवुड के करोड़ों रुपये डूबे? साउथ की इन 5 फिल्मों ने अक्षय और शाहिद जैसे सुपरस्टार्स को आईना दिखा दिया Wah Times News
बॉलीवुड की 'नकल' फिल्में और साउथ का असली दम: क्या अब सिर्फ रीमेक के भरोसे चलेगा bollywood films सिनेमा?
आजकल जब भी किसी नई फिल्म का ट्रेलर आता है, तो दिल में एक अजीब सी बेचैनी होती है। बेचैनी इस बात की नहीं कि फिल्म कैसी होगी, बल्कि इस बात की कि क्या ये कहानी भी कहीं से उठाई गई है? एक आम हिंदुस्तानी होने के नाते हमें सिनेमा से बहुत लगाव है, पर सच कहूँ तो अब वो पहले वाला जादू फीका पड़ता जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे हमारे डायरेक्टर्स के पास अब नए आइडियाज की कमी हो गई है और वो बस बनी-बनाई 'फोटोकॉपी' बेच रहे हैं।
आज Wah Times News के इस खास लेख में हम उन फिल्मों की बात करेंगे जहाँ बॉलीवुड ने साउथ की हिट फिल्मों को छूने की कोशिश तो की, पर बुरी तरह नाकाम रहा। चलिए, थोड़ा गहराई से समझते हैं कि आखिर गलती कहाँ हो रही है।
1.bachchan paadey: जब मसाला भारी पड़ा कहानी पर
जब हम Bachchhan Paandey Akshay Kumar remake movie की बात करते हैं, तो दिमाग में सबसे पहले वही घिसा-पिटा बॉलीवुड फॉर्मूला आता है। साउथ की ओरिजिनल फिल्म 'जिगरथंडा' एक ऐसी फिल्म थी जिसमें एक गैंगस्टर की रूह दिखाई गई थी, जो अंदर से कलाकार बनना चाहता था। लेकिन भाई, हमारे यहाँ क्या हुआ?
अक्षय कुमार की इस फिल्म में इतना ज्यादा शोर और बिना सिर-पैर की कॉमेडी डाल दी गई कि फिल्म की असली गहराई ही खत्म हो गई। दर्शकों को लगा कि वो कोई गंभीर फिल्म नहीं, बल्कि एक मेला देख रहे हैं। यही वजह है कि Bachchhan Paandey box office collection उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। जब आप एक डार्क थ्रिलर को जबरदस्ती 'मसाला फिल्म' बनाने की कोशिश करते हैं, तो नतीजा अक्सर ऐसा ही होता है—फीका और बेअसर।
2. Laxmi movie: चकाचौंध में खो गई कहानी की आत्मा।
अक्षय कुमार की एक और फिल्म जिसकी बहुत चर्चा हुई, वो थी Laxmii movie Akshay Kumar remake. ये फिल्म साउथ की सुपरहिट 'कांचना' का हिंदी वर्जन थी। 'कांचना' को लोग आज भी टीवी पर बार-बार देखते हैं क्योंकि उसमें डर के साथ एक बहुत ही गहरा Human Connection और सामाजिक संदेश था।
लेकिन Laxmii movie flop or hit की बहस में अगर ईमानदारी से देखें, तो ये फिल्म सिर्फ चिल्लाने और अजीबो-गरीब हरकतों तक सिमट कर रह गई। इसमें वो 'डर' और 'दर्द' महसूस ही नहीं हुआ जो ओरिजिनल फिल्म की जान थी। बॉलीवुड अक्सर यह भूल जाता है कि सिर्फ महंगी लाइटिंग और बड़े स्टार्स लेने से फिल्म हिट नहीं होती; उसके लिए वो 'देसी अहसास' जरूरी है जो दर्शक के दिल की धड़कन बढ़ा दे।
3. Jersey: एक्टिंग अच्छी, पर वो 'बाप-बेटे का दर्द' कहाँ गया?
शाहिद कपूर एक ऐसे कलाकार हैं जो अपना सब कुछ झोंक देते हैं, और Jersey movie Shahid Kapoor remake में भी उन्होंने कड़ी मेहनत की। लेकिन भाई, नानी (Nani) की जो ओरिजिनल फिल्म थी, उसकी बात ही कुछ और थी।
वहाँ एक हारे हुए क्रिकेटर की बेबसी और उसका अपने छोटे से बेटे के लिए कुछ कर गुजरने का जुनून इतना Heartfelt था कि पत्थर दिल इंसान की आँखों से भी आंसू निकल आएँ। हिंदी वर्जन तकनीकी रूप से बहुत चमक-धमक वाला था, लेकिन वो जो एक 'इंसानी दर्द' (Human Pain) होता है, वो कहीं न कहीं पर्दे पर आने से रह गया। शायद हम बॉलीवुड वाले हर चीज़ को इतना परफेक्ट और ग्लैमरस बनाना चाहते हैं कि असली जिंदगी की वो 'कच्ची सच्चाई' कहीं पीछे छूट जाती है।
4. Shahjada: उधार का स्वैग ज्यादा दिन नहीं चलता।
कार्तिक आर्यन ने जब अल्लू अर्जुन की फिल्म का रीमेक Shehzada movie remake किया, तो ऐसा लगा जैसे कोई बच्चा बड़े आदमी के जूते पहनने की कोशिश कर रहा हो। अल्लू अर्जुन का वो स्टाइल, वो आंखों की मस्ती और वो सादगी भरा टशन उनका अपना है, उसे कॉपी नहीं किया जा सकता।
जब हम Bollywood vs South cinema की तुलना करते हैं, तो यही फर्क नजर आता है। साउथ के सितारे अपनी भाषा और अपने कल्चर के साथ सहज लगते हैं, जबकि हमारे यहाँ सब कुछ बहुत 'बनावटी' और प्लास्टिक जैसा लगता है। दर्शकों ने साफ़ कह दिया कि भाई, हमें ओरिजिनल पसंद है, ये फोटोकॉपी नहीं।
5. Vikarm vedha : स्टाइल तो मिला, पर गहराई रह गई।
ऋतिक रोशन और सैफ अली खान जैसे दिग्गजों को एक साथ देखना किसी सपने जैसा था। Vikram Vedha Hindi remake एक अच्छी कोशिश तो थी, पर ये उस 'जादू' को नहीं पकड़ पाई जो विजय सेतुपति और आर. माधवन ने पैदा किया था। वहाँ की गलियों की वो धूल, वो पसीना और वो सादगी फिल्म को असली बनाती थी। यहाँ सब कुछ बहुत ज्यादा 'पॉलिश्ड' कर दिया गया। कभी-कभी सादगी ही सबसे बड़ा गहना होती है, जिसे बॉलीवुड अक्सर नजरअंदाज कर देता है।
Wah Times News का नजरिया और हमारी सलाह
मेरे प्यारे भाइयों और सिनेमा के दीवानों, Wah Times News का मानना है कि हमें सिनेमा को सिर्फ पैसे छापने की मशीन नहीं समझना चाहिए। एक फिल्म हजारों लोगों के सपनों और मेहनत से बनती है। हमारी कुछ खास सलाहें हमारे मेकर्स के लिए:
- गली-नुक्कड़ की कहानियाँ लाओ: हमारे देश के हर छोटे शहर और गाँव में ऐसी कहानियाँ दबी पड़ी हैं जिन पर शानदार फिल्में बन सकती हैं। हमें साउथ की तरफ ताकने की जरूरत नहीं, बस अपनी आँखें खोलने की जरूरत है।
- इमोशन पर काम करो, चमक-धमक पर नहीं: अगर कहानी में दम है, तो बिना किसी बड़े सेट के भी फिल्म सुपरहिट हो सकती है। दर्शकों को 'फीलिंग' चाहिए, 'स्पेशल इफेक्ट्स' नहीं।
- इंसानी जुड़ाव (Human Touch) सबसे ऊपर: दर्शक को लगना चाहिए कि पर्दे पर जो लड़का रो रहा है, वो उसका अपना भाई है। जब तक ये अपनापन नहीं आएगा, फिल्में फ्लॉप होती रहेंगी।
निष्कर्ष: अब तो जाग जाओ बॉलीवुड!
अंत में बस इतना ही कहूँगा कि साउथ की फ़िल्में इसलिए जीत रही हैं क्योंकि वो अपने दर्शकों की नब्ज पहचानते हैं। वो हमें वो दिखाते हैं जिससे हम जुड़ाव महसूस करें। वहीं बॉलीवुड अब भी शायद उसी भ्रम में है कि रीमेक बनाकर वो बच जाएगा।
पर अब जनता समझदार है। हमें 'नकल' नहीं, 'असली' सिनेमा चाहिए। उम्मीद है कि आने वाले समय में हमें Original Bollywood Content देखने को मिलेगा जो वाकई में हमारे और आपके दिल के करीब हो।
लेखक - अमोल इंडिया
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी अनुभव और फिल्मी समझ पर आधारित हैं। हमारा उद्देश्य किसी भी कलाकार, फिल्म या प्रोडक्शन हाउस की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है, बल्कि सिनेमा के प्रति एक स्वस्थ चर्चा को बढ़ावा देना है। फिल्मों की सफलता या विफलता के आंकड़े अलग-अलग स्रोतों से लिए गए हो सकते हैं।





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