1932 खतियान: झारखंडी हक की लड़ाई या कागजों की उलझन? जानिए पक्ष, विपक्ष और झारखंडवासियों की रोजगार की पूरी कहानी
1932 खतियान: झारखंडी हक की लड़ाई या कागजों का उलझन पक्ष, विपक्ष और झारखंडियों की रोजगार कि पूरी कहानी

1. पक्ष वालों की चुनौती...
2. विपक्ष का तीखा सवाल...
3. सबसे बड़ी बहस
4. कानूनी उलझने...
Wah Times News(अंदाज़ आपके जैसा) जोहार झारखंड आज हम उस मुद्दे की जड़ तक जाएंगे जिसने झारखंड के हर घर, खेत और खलिहान से लेकर चौक चौराहे तक बहस छेड़ दी है— 1932 का खतियान। कोई इसे अपनी हक और पहचान बता रहा है, तो कोई इसे कानूनन नामुमकिन और पुराने समय की बात। चलिए, आज हम और आप मिलकर इस उलझनों सुलझाते हैं।
1. पक्ष वालों की चुनौती "खतियान ही हमारी ढाल है"
जो लोग जयराम महतो (टाइगर) और इस आंदोलन के साथ खड़े हैं, उनका दर्द बड़ा सीधा है।
पहचान की लड़ाई: - वे कहते हैं, भाई अगर हमारे पास 1932 का कागज नहीं होगा, तो हम ये कैसे साबित करेंगे कि हम इसी मिट्टी के लाल हैं?" उनके लिए खतियान सिर्फ एक कागज नहीं, बल्कि उनकी जमीन और पुरखों की इज़्ज़त और पहचान है।
नौकरी पर पहला हक:- पक्ष वालों का मानना है कि अगर 1932 का नियम कड़ाई से लागू हो जाए, तो बाहर के लोग हमारे राज्य की नौकरियां नहीं छीन पाएंगे। उनका तर्क है कि झारखंड की नौकरी पर पहला हक यहाँ के खतियानी का ही होना चाहिए।
2. विपक्ष का तीखा सवाल: "क्या हम आज भी अंग्रेजों के गुलाम हैं अंग्रेजों का सिस्टम लागू करना शहीदों व देश का अपमान है।
दूसरी तरफ विपक्ष और कुछ जानकार, एक ऐसी बात उठाते हैं जो सोचने पर मजबूर कर देती है।
शहीदों का अपमान: विपक्ष का कहना है कि , भगवान बिरसा मुंडा और सिद्धू-कान्हू जैसे वीरों ने अपनी जान इसलिए दी ताकि हम अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो सकें। अगर हम आज भी 1932 (अंग्रेजों के समय) के सर्वे को ही ढोते रहेंगे, तो यह उन वीरों के बलिदान का अपमान होगा।
आज़ाद भारत का कानून: उनका तर्क है कि जब 1932 में हमारा देश आजाद नहीं था और हमारा संविधान भी नहीं बना था, तो हम उस समय के पुराने नियमों में क्यों बंधें? क्या आज़ाद भारत में हम अपनी नई पहचान नहीं बना सकते जो सबको जोड़कर चले?
3. सबसे बड़ी बहस: हुनर बड़ा या कागज?
नौकरी के सवाल पर एक बहुत बड़ी बहस छिड़ी हुई है। यहाँ दो तरह की सोच सामने आती है:
नौजवानों का डर: झारखंड का युवा कहता है कि अगर 'बाहरी' और 'भीतरी' का फर्क नहीं होगा, तो बड़े शहरों के कोचिंग से पढ़कर आए लोग यहाँ की सारी सीटें ले जाएंगे। हमें बराबरी का मौका तभी मिलेगा जब हमारी पहचान सुरक्षित होगी।
काबिलियत का तर्क: वहीं विपक्ष कहता है कि - नौकरी कागज से नहीं, काबिलियत (Skill) से मिलती है।" उनका कहना है कि जो काबिल होगा, वही नौकरी पाएगा। सरकार की अपनी नीतियां होती हैं और आज के कंपटीशन के जमाने में सिर्फ 1932 के भरोसे बैठना ठीक नहीं है। युवाओं को खुद को इतना मजबूत बनाना चाहिए कि वे अपनी काबिलियत के दम पर नौकरी छीन सकें। ऐसे पेचीदे बातों को लेकर कुछ लोग राजनीति की रोटियां सेकने के काम कर रहे हैं, और आपस में हम लोग आम जनता लड़ रहे हैं।
4. कानूनी पेंच: क्यों लटक जाती है बात?
अब आप पूछेंगे कि अगर जनता चाहती है तो लागू क्यों नहीं होता? यहाँ मामला कोर्ट में फंस जाता है।
संविधान की दीवार: हमारा कानून कहता है कि भारत का हर नागरिक बराबर है। आप किसी को नौकरी देने से सिर्फ इसलिए मना नहीं कर सकते क्योंकि उसके पास एक खास साल का कागज नहीं है। इसी वजह से जब भी ऐसी नीति बनती है, कोर्ट उसे रद्द कर देता है।
9वीं अनुसूची की उम्मीद: जयराम महतो और समर्थक कहते हैं कि अगर केंद्र सरकार इसे विशेष सुरक्षा (9वीं अनुसूची) दे दे, तो कोर्ट भी कुछ नहीं कर पाएगा। लेकिन यह केंद्र और राज्य की राजनीति के बीच फुटबॉल बना हुआ है।
जनता क्या सोच रही है?
गांव की गलियों में बुजुर्ग कहते हैं— "हक तो मिलना चाहिए, पर क्या सिर्फ लड़ने-झगड़ने से पेट भरेगा?" झारखंडी जनता को ऐसी नीति चाहिए जो कानूनी रूप से इतनी मजबूत हो कि कोर्ट में एक दिन भी न टिकने वाली न हो, बल्कि हमारे बच्चों का भविष्य संवारने वाली हो।
निष्कर्ष:
1932 खतियान एक जज्बात है, लेकिन इसे हकीकत में बदलने के लिए सिर्फ जोश नहीं, होश की भी ज़रूरत है। पक्ष हो या विपक्ष, सबको मिलकर ऐसी राह निकालनी होगी जहाँ झारखंडी की पहचान भी बचे और काबिलियत को सम्मान भी मिले।
आपकी क्या राय है? क्या 1932 ही हमारी पहचान का इकलौता रास्ता है, या हमें हुनर और नई नीतियों पर ध्यान देना चाहिए? नीचे कमेंट में अपनी बात ज़रूर रखें, क्योंकि ये आपके हक की खबर है।

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